एक नन्हा-सा पौधा तुलसी का,
पनपा मेरे मन के एक कोने में,
प्रार्थना-सा प्रति दिन लहराता,
सुकोमल साँसों का करता दान
सतत प्राणवायु बहाता आँगन में
संताप हरण करता हृदय का,
संतोष का सुखद एहसास सजा,
पीड़ा को पल में हरता वह हर बार |
मूल में मिला मुझे इसके अमूल्य सुख का,
सुन्दर सहज सुकोमल सार,
पल-पल सींच रही साँसों से,
मन की मिट्टी में बहायी स्नेह की स्निग्ध-धार |
नमी नेह की न्यौछावर की,
अँकुरित हुए पात प्रीत के,
करुण वेदना सहकर बलवती हुआ,
मन-आँगन में वह पौधा हर बार |
मनमोही मन मुग्धकर लहराता,
पागल पवन के हल्के झोंकों संग,
तब मुखरित हरित देव ने पहनाया,
प्रेम से पनीले पत्तों का सुन्दर हार |
खनका ख़ुशी का ख़ज़ाना आँगन में,
खिली चंचल धूप अंतरमन में,
चित्त ने किया सुन्दर शृंगार,
महका मन का कोना-कोना,
तुलसी का पौधा लहराया जब मन में हर बार |
© अनीता सैनी

