जब भी सहलाया मैंने
आँखों में साहस को और
बलवती पाया मैंने।
निर्मल पौधा क्षमादान का
संजीदगी से सींचती आयी।
छिपा रहस्य इंसानियत का
संवेदना से निखरा पाया।
स्थूल जिव्हा मर्मान्तक की
शब्दजाल का न प्रभाव गढ़ा
पूछ रहा प्रिये पीड़ा मन की
प्रीत जता वाकया नैनों में गढ़ा।
पलकों से पोंछती अश्रु अपने
ज़ख़्मों ने राह कहीं और बनायी।
एक चिड़िया ने यह व्यथा बतायी।
आहट न सांसों को हो पायी।
©अनीता सैनी 'दीप्ति'

