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शनिवार, अप्रैल 18

अश्रुओं से मुरझाया आक


जीवन माँझे-सा उलझा है 
 राहत पाने को अकुलाये ।
 बेचैनी में सिमटी सांसें 
कौतुहल कोहराम मचाये।

दीन-हीन सूखे पतझड़ से 
कैसे पीड़ा को संभाले ।
हंस रूप धारण कर कौए 
पर पीड़ा को नहीं निवाले ।
खेल नियति भी हार चुकी है 
विडंबनाएं चिह्न दिखायें ।।

क्षुधा कुलबुलाती अंतड़ियाँ 
अश्रुओं से मुरझाया आक ।
नन्ही पौध भूख से व्याकुल
निसर्ग हुआ नि:शब्द अवाक। 
दीप करुणा का जले जहाँ में  
गुलमोहर-सा जग खिल जाये ।।

हर मौसम की मार झेलता
मृगतृष्णा से रहे भरमाता  ।
तेज़ घाम में भी खिल जाता 
दुख-तपन से नहीं  घबराता ।
शीतल नीर बहा अब मानव 
लख गुण मानवता हर्षाये।।

©अनीता सैनी  'दीप्ति'