घूँघट ओट याद हर्षाती ।
मुँह फेरुँ तो मिले कान्हाई,
जीवन मझधारे तरसाती ।।
साँझ-विहान गुँजे अभिलाषा,
मनमोहिनी- मिलन को आयी।
प्रिये की छवि उतरी नयन में,
अश्रुमाला गिर हिय समायी।
जलती पीड़ा दीप माल-सी,
यादें माधव की रूलाती ।।
बारंबार जलाती बैरन,
भेद कँगन से कह-कह जाती।
भूली-बिसरी सुध जीवन की,
समय सिंधु में गोते खाती।
हरसिंगार सी पावन प्रीत,
अभिसारिका बन के लुभाती ।।
नीरव पीड़ा है अदृश्य सी
याद रेख की जलती ज्वाला
भूली रूप फूल की डाली
लूट विभा विदेह की बाला
करुण पुकार हृदय आँगन की
बुलबुल- भांति तड़पती रहती।।
©अनीता सैनी

