आज सुबह अधमरे अख़बार के पलटती पन्ने,
उठते तूफ़ान की नहीं कोई ख़बर।
शहर की ख़ामोशी में चारों ओर शांति ही शांति
नहीं कोहराम का कोई कोंधता आलाप।
एक माँ चीख़ी...
बच्चे की थी करुण पुकार
जग ने कहा -
माँ-बेटे की पीड़ा का विलाप! नहीं नियति पर ज़ोर।
पूछ-पूछ पता घरों का, देगा दस्तक यह तूफ़ान
बाक़ी मग्न झूमो जीवन में सुख का थामे छोर।
दीन-दुनिया से बेख़बर व्यस्तता की
महीन चादर ओढ़े दौड़ रहे सब ओर।
सूरज बरसाता चिलचिलाती धूप पृथ्वी पर
हवा भी मंद-मंद झूम रही एक ओर।
बुरा न देखो, बुरा न सुनो, बुरा न कहो
उमसाए सन्नाटे ने बाँधी ज़ुबाँ की डोर।
अंतस में उमड़े सैलाब को न कहो तूफ़ान
पत्ते गिरे होंगे पेड़ों से! भ्रम ने थामी होगी डोर।
©अनीता सैनी'दीप्ति'

