ठीक पहले
✍️ अनीता सैनी
……
ऐसा नहीं है
कि उसे लिखना नहीं आया
स्त्रियाँ बहुत कम लिखती हैं
वे बस जीती हैं।
मोक्ष के द्वार पर
सबसे पहले
पहुँची स्त्री के
पाँवों में आज भी अतीत की धूल है,
आँखों में
अनगिनत जन्मों की थकान,
और हथेलियों में
किसी और के सपनों की रेखाएँ।
वह अपने रास्ते की कथा
पीड़ा की स्याही से
लिख सकती थी
धरती को शब्दों से भर सकती थी,
पर उसने
मौन को ही
अपना आख्यान
लिखने दिया।
उसने पुरुष को
सीने से लगाया
जैसे कोई वृक्ष
आकाश को थाम लेता है,
और उसी क्षण
पहली बार प्रेम में पड़ी स्त्री ने
अपने पाँवों तले की ज़मीन
धीरे से सरका दी।
वह खड़ी रही
देर तक…
पर भीतर नहीं गई
अभी
उसके हाथों
लिखी जानी थी
किसी और की मुक्ति।
और इस तरह,
हर बार
मोक्ष के द्वार से
ठीक पहले
स्त्री
जीवन में
लौट आती है।

बड़ी गहरी बात कही है अनीता जी आपने
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