बुधवार, अक्टूबर 7

आवाज़


आवाज़
✍️ अनीता सैनी
…….

रेत के भीतर
कितनी आवाज़ें थीं
मैंने कभी
उन्हें सुनना नहीं चाहा।

वे साँस लेतीं,
तो मेरे पास
कुछ और अधूरा-सा
लिखा रह जाता
और
वे चली जातीं।

मैं उन्हें
मिटना नहीं कहती।

मरुस्थल चुप था,
पर उसकी चुप्पी में
कुछ था
जो रेत नहीं थी।

उठती आँधियाँ
ग़ुस्सा नहीं,
मरुस्थल की
गर्म साँसें थीं।

हवा थम गई।
रेत फिर शांत हुई।

और मैं
उसी शांति में
देर तक
कुछ सुनती रही।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 08 अक्टूबर 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!


    !

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  2. मरुथल के सन्नाटे में प्रकृति कितना कुछ कह जाती है, कभी वहाँ भी हरे-भरे गुलशन थे, पर आज! मन में भी कभी बसंत और कभी पतझड़ आता है, मरुथल भी उग आते हैं, पर उसकी गहराई में बहती है शीतल धारा सदा ही कोई

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  3. वाह! क्या पंक्तियाँ हैं अनीता जी !
    उठती आँधियाँ
    ग़ुस्सा नहीं,
    मरुस्थल की
    गर्म साँसें थीं।

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