शनिवार, सितंबर 26

उस पार


उस पार
✍️ अनीता सैनी

…

हे जीवन,
इतना भी मत कस
अपनी मुट्ठी की गिरह,
कि भीतर बैठी चिड़िया
आकाश का नाम भूल जाए।

इतना भी मत खींच
दिनों की रस्सी,
कि उसकी रगड़ से
आत्मा की हथेलियाँ छिलने लगें।

इतना भी मत बढ़ा
दोपहर की चुप्पी,
कि छाँह की स्मृति तक
पेड़ों से झर जाए।

इतनी भी मत लाद
पीठ पर गठरियाँ,
कि चलते-चलते
पगडंडियाँ ही साँस लेने को ठहर जाएँ।

और तभी
भीतर कोई अनकहा विचार
धीरे से सिर उठाए

क्या उस पार
सचमुच कोई ऐसी सांझ है
जो चौखट पर रखे दीप की तरह
देर तक जलती है,
पर किसी को पुकारती नहीं।

जहाँ किनारों पर
पैरों के निशान नहीं,
केवल उनकी दिशा बची रहती है।

जहाँ पुरानी गठरी का भार
कपड़े पर रह जाता है,
देह पर नहीं।
और साँसें
अपने कंधों से उतरकर
हवा में घुल जाती हैं।

और एक थका हुआ मन
कुएँ में झुके जल-सा
कुछ देर
अपनी ही गहराई देखता रहता है।

2 टिप्‍पणियां:

  1.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 28 सितंबर, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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