धूप और छाँव के बीच
✍️ अनीता सैनी
वृक्ष भी देखता है-
धूप, छाँव के खेल में
कौन कितना झरा,
और अंत में
किसके हिस्से बची धूप
वे
आते-जाते पाँव
कितने कँपे,
कितनी देर तक
ठहरी रही धरती,
और साँसें
पिघलकर
कितनी बह गईं।
प्रतीक्षा
धीरे-धीरे
बिखरती रही
कठोर होती हुई भी
मिट्टी-सी नर्म रहकर
टूटती रही।
वह स्वयं
सहारा ढूँढ़ती रही
थोड़ा पत्थर हो जाने भर को।
पर समझ नहीं पाई
जीवन में अधिक पीड़ा
धूप देती है
या छाँव।
धूप
देह जलाती है,
पर छाँव
कभी-कभी भीतर उतरकर
टटोलती है
कि साँसें
अब भी बची हैं क्या,
प्राण
शेष हैं भी
या नहीं।
और तब लगता है
दुनिया में उतरना नहीं,
उतरने का अभिनय करना भर ही
अब शेष रह गया है।
जैसे थका हुआ वृक्ष
अपने ही साये से पूछे-
“क्या सचमुच
मैं अब भी खड़ा हूँ?”

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