भात की गंध
✍️ अनीता सैनी
‘था’
अक्सर
दीवारों पर चिपका रह जाता है
धुएँ की पतली परत बनकर,
जिसे बरसों बाद भी
उँगलियाँ छू लें
तो गंध लौट आती है।
और जो ‘होगा’
वह चौखटों पर टँगा रहता है
पुरानी चाबियों की तरह,
जिनसे
अब कोई दरवाज़ा नहीं खुलता,
पर स्त्रियाँ
उन्हें फेंकती भी नहीं हैं।
पर ‘है’
वह रसोई में
चुपचाप जलती आँच की तरह होता है,
जिस पर
भात सुबह-शाम पकता रहता है।
भात उफ़नता है
पानी के साथ
बार-बार बाहर झाँकता है,
पर कोई कवि
ढक्कन पूरा नहीं हटाता
वह
किनारे से
थोड़ा सरकाकर देखता है
कि भात कितने पके हैं।
कुछ कविताओं में
जले भात की गंध लौटती है,
कुछ में
अधपके दानों की कड़वाहट।
पर ‘है’
धीमे-धीमे देर तक
सबसे अधिक जलता है,
और सबसे कम दर्ज होता है।
जली लकड़ी की राख की तरह,
जिसे
चूल्हे से उठाकर
चुपचाप बाहर फेंक दिया जाता है।
