मंगलवार, अक्टूबर 27

पीठ पर दरवाज़ा


पीठ पर दरवाज़ा

✍️ अनीता सैनी

….


मैंने

स्मृति की तह में हाथ डाला,

उँगलियों पर

एक पुराना स्पर्श लगा रह गया।


उसे धोने के लिए

मैं कुएँ तक गई,

पानी में

एक डूबा हुआ दिन तैर रहा था।


मैंने उसे उलटकर देखा

उसकी पीठ पर

एक दरवाज़ा था,

जिसकी चौखट से

मेरी ऊँचाई नापी गई थी।


मैं लौटना नहीं चाहती थी,

पर मेरे भीतर

कोई लगातार

पीछे की ओर खुल रहा था।


एक रात

मैंने अपनी परछाईं को

आगे जाने दिया

और स्वयं

उसके छूटे हुए अँधेरे में उतर गई।


रास्ते पर

मेरे पैरों के निशान नहीं थे,

कुछ दूर तक

मेरी परछाईं उलटी पड़ी थी।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 28 अक्टूबर 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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