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मंगलवार, अक्टूबर 27

पीठ पर दरवाज़ा


पीठ पर दरवाज़ा

✍️ अनीता सैनी

….


मैंने

स्मृति की तह में हाथ डाला,

उँगलियों पर

एक पुराना स्पर्श लगा रह गया।


उसे धोने के लिए

मैं कुएँ तक गई,

पानी में

एक डूबा हुआ दिन तैर रहा था।


मैंने उसे उलटकर देखा

उसकी पीठ पर

एक दरवाज़ा था,

जिसकी चौखट से

मेरी ऊँचाई नापी गई थी।


मैं लौटना नहीं चाहती थी,

पर मेरे भीतर

कोई लगातार

पीछे की ओर खुल रहा था।


एक रात

मैंने अपनी परछाईं को

आगे जाने दिया

और स्वयं

उसके छूटे हुए अँधेरे में उतर गई।


रास्ते पर

मेरे पैरों के निशान नहीं थे,

कुछ दूर तक

मेरी परछाईं उलटी पड़ी थी।

बुधवार, अक्टूबर 14

जादुई झोला


जादुई झोला

✍️ अनीता सैनी
.......

कवि के पास
एक झोला होता है-
जादुई झोला।

नियति
उसे भेंट देती है।

उसमें रंग-बिरंगी
कविताएँ होती हैं।

शुरू-शुरू में
कवि उसे
कंधे पर टाँगने से इनकार करता है।

नियति उसे
डाँटती-फटकारती है।
एक उम्र तक
दोनों खूब झगड़ते हैं।

फिर 
एक दिन
कवि झोले में हाथ डालता है।

रंगों के बीच
नियति की उँगलियाँ
छू जाती हैं।

उस दिन 
कवि 
नियति के प्रेम में पड़ जाता है।

और वह
कवि से जादूगर हो जाता है।

बुधवार, अक्टूबर 7

आवाज़


आवाज़
✍️ अनीता सैनी
…….

रेत के भीतर
कितनी आवाज़ें थीं
मैंने कभी
उन्हें सुनना नहीं चाहा।

वे साँस लेतीं,
तो मेरे पास
कुछ और अधूरा-सा
लिखा रह जाता
और
वे चली जातीं।

मैं उन्हें
मिटना नहीं कहती।

मरुस्थल चुप था,
पर उसकी चुप्पी में
कुछ था
जो रेत नहीं थी।

उठती आँधियाँ
ग़ुस्सा नहीं,
मरुस्थल की
गर्म साँसें थीं।

हवा थम गई।
रेत फिर शांत हुई।

और मैं
उसी शांति में
देर तक
कुछ सुनती रही।