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मंगलवार, मार्च 31

बाबा, अब तुम सो जाया करो


बाबा, अब तुम सो जाया करो

✍️ अनीता सैनी

…..

बाबा,

अब तुम सुकून से सो जाया करो।

रात को आँगन में चाँद जब उतर आए,

तो उसकी चुप्पी ओढ़ लिया करो।

दो वक़्त की रोटी पेट भर खा लिया करो,

अब मैं 

तुम्हारी थाली की आख़िरी रोटी नहीं हूँ,

जो तुम मेरे हिस्से में सरका देते थे।


बाबा,

ज़िंदगी की लकीर कुएँ के जल-सी नहीं,

हथेलियों की दरारों-सी होती है

चुपचाप रिसती रहती है।

मेरी फ़िक्र छोड़ दो,

अब तुम निश्चिंत हो जाया करो।


तुम कहते थे

“चार अक्षर पढ़ लेगी

तो दुनिया समझ जाएगी…”

देखो बाबा,

मैंने सच में

चार अक्षर पढ़ लिए हैं।

अब कोई ठग मेरी आँखों में धूप भरकर

मुझसे मेरा आकाश नहीं छीन सकता।


तुम्हें आज भी

सब्ज़ी के भाव चुभते होंगे,

पर तुम्हारी बेटी

अब भी

प्याज़-रोटी में

अपना स्वाद ढूँढ लेती है।


मैंने सिर पर

एक आसमान टाँक लिया है, बाबा,

अब बादल गरजते हैं

तो भीतर कुछ नहीं काँपता।


तुम देखना,

दो पग ज़मीन भी

धीरे-धीरे जोड़ ही लूँगी।

तुमने जैसे

रेत में पसीना बोकर

घर उगाया था,

एक दिन

मैं भी उगा ही लूँगी।


और हाँ बाबा,

तुम्हारा जवाई…

मेरे सिर पर हाथ रखता है,

और उस स्पर्श में

तुम्हारी उँगलियों की गरमी

अब भी बाकी है।


अब तुम

सर उठाकर चला करो।

आकाश में

आजकल तारे बहुत साफ़ दिखते हैं,

जैसे किसी ने

पुरानी धूल झाड़ दी हो।

और जब भी

नींद आँखों से रूठे,

तो समझ लेना

तुम्हारी बेटी

अपने हिस्से की जाग

तुम्हारे लिए जी रही है।


अब सच में

सो जाया करो, बाबा,

तुम्हारी सारी चिंताएँ

मैंने अपने आँगन की खूँटी पर

बाँध दी हैं।


1 टिप्पणी:


  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 1 अप्रैल 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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