मंगलवार, मई 19
अधखुला किवाड़
शनिवार, मई 9
धूप और छाँव के बीच
धूप और छाँव के बीच
✍️ अनीता सैनी
वृक्ष देखता है-
धूप, छाँव के खेल में
कौन कितना झरा,
और अंत में
किसके हिस्से बची धूप
वे
आते-जाते पाँव
कितने कँपे,
कितनी देर तक
ठहरी रही धरती,
और साँसें
पिघलकर
कितनी बह गईं।
प्रतीक्षा
धीरे-धीरे
बिखरती रही
कठोर होती हुई भी
मिट्टी-सी नर्म रहकर
टूटती रही।
वह स्वयं
सहारा ढूँढ़ती रही
थोड़ा पत्थर हो जाने भर को।
पर समझ नहीं पाई
जीवन में अधिक पीड़ा
धूप देती है
या छाँव।
धूप
देह जलाती है,
पर छाँव
कभी-कभी भीतर उतरकर
टटोलती है
कि साँसें
अब भी बची हैं क्या,
प्राण
शेष हैं भी
या नहीं।
और तब लगता है
दुनिया में उतरना नहीं,
उतरने का अभिनय करना भर ही
अब शेष रह गया है।
जैसे थका हुआ वृक्ष
अपने ही साये से पूछे-
“क्या सचमुच
मैं अब भी खड़ा हूँ?”
गुरुवार, मई 7
भात की गंध
रविवार, अप्रैल 26
प्रतीक्षा से परे
प्रतीक्षा से परे
✍️ अनीता सैनी
नदी के किनारे
बैठे रहना वर्षों तक
प्रतीक्षा को साधना समझकर।
फिर एक दिन जाना
प्रतीक्षा
धीरे-धीरे धड़कनों को
पत्थर की चुप्पी में बदल देती है,
और करुणा
उसी पत्थर की दरारों से
फिर जल का रास्ता खोज लेती है।
विरह लिखा गया,
पीड़ा भी
और अंत में
एक सूखी पत्ती-सा लिख दिया गया
कि कुछ भी स्थायी नहीं होता।
न अपमान,
न प्रेम का आग्रह,
न ही वह आवाज़
जो दीवारों में गूँजकर
वापस लौट आती थी।
सब चुपचाप
समय की धारा में घुल जाता है
जैसे पगडंडी पर ठहरा पानी
धूप की पहली किरण में
बिना शोर सूख जाता है।
बस एक हल्की-सी नमी बचती है
चलते रहने की,
बिना पीछे देखे।
अब
कुछ नहीं किया जाता
न समझा जाता है,
न समझाया जाता है,
न माँगा जाता है,
न किसी को दोष दिया जाता है।
बस देखा जाता है
जैसे पेड़
ऋतुओं के आने-जाने को
अपनी जड़ों में दर्ज करते हैं,
जैसे नदी
किनारों को छूकर भी
उन्हें अपने साथ नहीं बाँधती।
भीतर अब
एक करुणा बहती है
निर्विकार, निरंतर
पत्थरों के लिए भी,
काँटों के लिए भी,
और उन हाथों के लिए भी
जिन्होंने छूकर
अपना कठोर होना सीखा था।
अब जाना गया है
दुनिया बाहर नहीं,
भीतर उगती है
मौन की मिट्टी में,
अनुभव की धूप में।
और वही भीतर का संसार
हर दिन
थोड़ा-थोड़ा परोसा जाता है
रोटी के साथ,
एक लंबी चुप्पी के साथ,
और उस मुस्कान के साथ
जिसमें अब कोई दावा नहीं,
कोई प्रतीक्षा नहीं
सिर्फ स्वीकृति की शांति है।
अब
डायरी में शब्द नहीं उतरते
बस
धीरे-धीरे
भीतर से बाहर
एक आकाश फैलता जाता है।
शनिवार, अप्रैल 18
धूप के माथे पर खिला एक फूल
बुधवार, अप्रैल 8
मैंने ही सींचा था, यह अँधेरा
मैंने ही सींचा था, यह अँधेरा
✍️ अनीता सैनी
……
कविता के भीतर
एक सूखी नदी में
रात का बासी पानी उँडेला गया था।
दलदल
बारिश का नहीं,
ठहरे आँसुओं का घर है।
कविता की काया पर
खरोंचें नहीं,
पर भीतर
एक जंगल है
जहाँ हर पेड़
किसी नाम से घायल है
पर कुछ नाम
अब पुकारे नहीं जाते।
धूप से मुँह मोड़ा गया,
छाँव पुकार ली गई,
और वही छाँव
धीरे-धीरे
एक लंबी, ठंडी सुरंग बन गई।
अब
उसी में बैठा है कोई,
जहाँ आवाज़
अपने ही कदमों से डरती है।
सपनों के घड़े
कभी भरे ही नहीं गए,
उनमें दरारें उकेरी गईं
कि कहीं भर गए
तो बह न निकलें।
और अब हथेलियों में
बस
रेत बची है,
जो
हर बार छूट जाती है।
हार है
किसी युद्ध की नहीं,
भीतर के
धीरे-धीरे हारते
विश्वास की।
डूबना है
समंदर का नहीं,
उस कुएँ का
जो चारों ओर
खुद ही खोदा गया।
अब
किनारे नहीं खोजे जाते,
बस
अँधेरा कंधों पर रखकर
इतना भर कहा जाता है
यह रात
किसी और की नहीं,
सींची गई थी
यही मेरी कमाई है।