पीठ पर परछाई
✍️ अनीता सैनी
…….
मैंने सपने नहीं देखे।
मेरे पास
कल्पना की तितली नहीं थी,
सच का
डोलता बड़ा-सा बादल था।
मेरे भार से
दुगुना।
मैं उसे
अपने साथ ढोती रही,
बिना यह कहे
कि उसकी छाया में
मेरी कल्पना
कितनी देर तक
साँस रोककर बैठी रही।
मैंने रूढ़ियाँ नहीं देखीं,
उनकी परछाइयाँ देखीं।
मुझसे एक कदम
पहले चलने वाली स्त्रियों
कीपीठ पर
उनकी परछाइयाँ थीं।
वे कहती थीं,
रूढ़ियाँ गढ़ने वाला
अपनी ही बनाई अँधेरी जगह में
खड़ा था।
बस।
मैंने उसे
कल्पना नहीं कहा।

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शुक्रवार 14 अगस्त, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंबेहतरीन
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