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बुधवार, जून 17

रेत के पार…

रेत के पार…
✍️अनीता सैनी 

…..
वह मरुस्थल में उगा एक वृक्ष था,
जहाँ पानी
सिर्फ स्मृति में बचा था,
और छाँव
कभी-कभी
किसी थकी हुई व्यवस्था-सी
चुपचाप उतर आती थी
कुछ चुनिंदा शाखाओं पर।

यहाँ छाँव
सबके हिस्से में नहीं आती,
और हवा भी
अपने-अपने रास्तों से गुजर जाती।

जिन शाखों तक छाँव पहुँच जाती है,
वे धीरे-धीरे
रसूख़दार कहलाने लगते हैं
जैसे जीवन ने उन्हें
कोई अनकही अनुमति दे दी हो।

वृक्ष यह सब देखता था,
लेकिन भीतर कहीं
उसे स्वीकार करना आसान नहीं था।
कभी-कभी
उसकी शरण में आए पक्षी
खुद ही उड़ जाते,
और हिरनियाँ
धूप में ठिठककर रह जातीं
जैसे रेत से बातें कर रही हों।

गहरी धूप थी,
तपती रेत थी,
और ठहराव…
यहाँ बहुत देर टिक नहीं पाता था।

कुएँ की आवाज़ें
कब की खो चुकी थीं,
घड़ों की ठंडक
किसी पुरानी याद में ढल गई थी।

सब कुछ धीरे-धीरे सूख गया था
जड़ों समेत
वे सारे दरख़्त भी,
जिनकी छाँव में
पहचानें आकार लेती थीं।

अब जड़ें भी
अपनी ही मिट्टी से
धीरे-धीरे
छूटती हुई लगती थीं।

और रेत…
हर पदचिह्न को
याद बनने से पहले
मिटा देती थी।

शायद तभी,
कभी बहुत धीमे से
यह बात भीतर रह जाती है
कि
रेत पर चलना ही नहीं,
कभी-कभी
रेत के पार जाना भी
सीखा दिया जाता है।

5 टिप्‍पणियां:

  1.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 20 जून, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  2. रेत पर चलना ही नहीं रेत के पार जाना भी सीखना है, मरुथल के वृक्ष की गाथा में छुपा है वर्तमान हालातों का यथार्थ चित्रण!! सुंदर सृजन

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