शनिवार, अप्रैल 18

धूप के माथे पर खिला एक फूल



धूप के
माथे पर खिला एक फूल

✍️ अनीता सैनी
…….
मरुस्थल में
जो प्यास लिए दौड़ती है,
वह मृगमरीचिका नहीं 
धूप के माथे पर
खिला एक फूल है।

पंखुड़ियों में उजास,
जड़ों में रेत की चुप्पी
पानी नहीं,
समय ही
रेत में उतरता है।

खेजड़ी-सा जीवन
धूप में भी
हरापन छुपाए रहता है।

नियति ने
उसके त्याग को ही
जल मान लिया है
उसे
वहीं रहने देना ही
शायद उसका जल है।

आकाश की ओर खुला,
जहाँ
सूरज से रंग उतरते हैं,
वह
गिरती हुई रोशनी के टुकड़ों में भी
अधूरा नहीं दिखता।

जड़ों तक मत जाना…
वहाँ
एक सूखा कुआँ है,
जहाँ प्रतीक्षाएँ
पानी नहीं,
रेत बनकर जम गई हैं।

वह फूल
भीतर से नहीं खिलता
धूप ही उसकी नमी है,
वही
उसे भीतर से सींचती है।

उसका प्रेम
ओस नहीं माँगता,
बस चुपचाप
समर्पित है,
और धीरे-धीरे
किसी और के उजाले में
अपना नाम
खो देता है।

यह भोग नहीं,
यह
कविता की देह है
जो छुई नहीं जाती,
बस जी जाती है।

अंत में
कुछ भी नहीं बचता,
सिवाय
एक फूल के
जो
धूप के माथे पर
अब भी
खिला है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बड़ी गंभीर बात कही है अनीताजी आपने इस कविता के माध्यम से। मनन करने योग्य यह।

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  2. अंत में
    कुछ भी नहीं बचता,
    सिवाय
    एक फूल के
    जो
    धूप के माथे पर
    अब भी
    खिला है।

    कितनी खुबसूरत पंक्तियाँ हैं , बधाई

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