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मंगलवार, मार्च 24

मौन की तलछट

मौन की तलछट
✍️ अनीता सैनी
नेपथ्य की धूल
कविता की जड़ों में उतरती
वह नमी है,
जो मिट्टी की नसों में बहती है
और पत्तों की हरियाली में
अनकही
उग आती है।

कुएँ की अँधेरी देह में
जल की तरह
ठहर जाती है
जहाँ गिरती हुई आवाज़ें
अपने ही वज़न से
धीरे-धीरे
डूबती हैं,
मौन की तलछट में बदलती,
और फिर
किसी अनजानी प्यास की दरार से
फिर से
कविता की तरह
रिसने लगती हैं।

वह रेत पर चलती
हवा नहीं,
एक अदृश्य खिसकन है
जिसके गुजरते ही
समय का कोई टीला
अपनी जगह
छोड़ देता है।

वह तितली से पहले की
बंद देह है,
जिसे उँगलियाँ
रेशम समझकर छूती हैं,
और भीतर
धीरे-धीरे
गलती हुई उड़ान
किसी और आकाश की
तैयारी करती है।

शब्दों के बाहर की वह जगह
जहाँ चुप्पियाँ
अपने ही टूटे हुए किनारों को
समेटती हैं,
और अर्थ
नेपथ्य की धूल में
धीरे-धीरे
दब जाते हैं।

हर कवि
वहीं आता है
अपने सबसे गहरे सच के साथ,
उन्हें उजाले से बचाकर
उसी अँधेरी तहों में
रख देता है
जहाँ वह 
बिना कहे
सबसे अधिक
ठहरता है।

शुक्रवार, मार्च 6

खार

कविता- खार

✍️ अनीता सैनी 
…..

मरुस्थल ने 
एक ही बात दोहराई
कि
सूरज ने नहीं,
एक महीन सुराख़ ने
समंदर को सोख लिया।

वह सुराख़
पुराना घाव बन जाता है,
जो
कभी पूरी तरह भरता नहीं।

वह बस त्वचा बदल लेता है।
भीतर
लावा की पतली नसें
धीरे-धीरे चलती रहती हैं।

कभी अचानक
कोई स्मृति
अँगुली रख देती है वहाँ
और त्वचा के नीचे
खारे पानी की एक झील
हल्की-सी काँप उठती है।

उसे दवा नहीं चाहिए 
उसे बस 
एक 
अदृश्य ठंडा फाहा चाहिए
जो रिसते हुए स्थान पर
अपना माथा रख दे
और कहे-
“तुम बिखरी नहीं हो,
तुम बस बहुत देर तक
आँधी में खड़ी रही।”

पर यहाँ
आकाश ताँबे का है,
धरती तपे हुए शंख-सी।

हवा-
अपने ही फेफड़ों में
अटकी हुई साँस है।

वह
जो कर्तव्य की लौ में
अपने स्पर्श को तपाकर रखता है,
प्रेम को
अनुशासन की अलमारी में
तह कर देता है।

उसकी चुप्पी
लोहे का दरवाज़ा नहीं,
एक ऐसा कुआँ है
जिसकी गहराई में
पानी तो बहुत है
पर रस्सी छोटी है।

वह
हर दिन
जिम्मेदारियों की थाली में
अपनी साँस परोसता है,
और रात को
आईने में देखता है
आँखों के नीचे
रेत क्यों जमा है?

कभी-कभी
वह अपने ही भीतर
एक मरुस्थल पार करता है।
पाँव जलते हैं,
पर कहीं दूर
धुँधला-सा
एक हरा बिंदु दिखता है।

उसी क्षण
मौन में
एक महीन दरार पड़ती है
जैसे शंख के भीतर
मोती बनने की पहली किरकिराहट।

उसके होंठ नहीं खुलते,
पर भीतर
कोई कहता है-
“सब ठीक होना
घटना नहीं,
धीरे-धीरे उगना है।”

और तब
तपती रेत के नीचे
एक अदृश्य बीज
अपने कठोर खोल को
अंदर से धकेलता है।

मौन
शोर से नहीं फूटता,
वह तब फूटता है
जब वह
अपने ही घाव पर
हवा बनकर बैठ जाता है।

और उसी क्षण
मरुस्थल की लकीरों में
एक नई रेखा जुड़ जाती है
नसीब की नहीं,
निर्णय की।