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बुधवार, अप्रैल 8

मैंने ही सींचा था, यह अँधेरा


मैंने ही सींचा था, यह अँधेरा

✍️ अनीता सैनी

……

कविता के भीतर

एक सूखी नदी में

रात का बासी पानी उँडेला गया था।


दलदल

बारिश का नहीं,

ठहरे आँसुओं का घर है।


कविता की काया पर

खरोंचें नहीं,

पर भीतर

एक जंगल है

जहाँ हर पेड़

किसी नाम से घायल है

पर कुछ नाम

अब  पुकारे नहीं जाते।


धूप से मुँह मोड़ा गया,

छाँव पुकार ली गई,

और वही छाँव

धीरे-धीरे

एक लंबी, ठंडी सुरंग बन गई।


अब

उसी में बैठा है कोई,

जहाँ आवाज़

अपने ही कदमों से डरती है।


सपनों के घड़े

कभी भरे ही नहीं गए,

उनमें दरारें उकेरी गईं

कि कहीं भर गए

तो बह न निकलें।


और अब हथेलियों में

 बस

रेत बची है,

जो

हर बार छूट जाती है।


हार है

किसी युद्ध की नहीं,

भीतर के

धीरे-धीरे हारते

विश्वास की।


डूबना है

समंदर का नहीं,

उस कुएँ का

जो चारों ओर

खुद ही खोदा गया।


अब

किनारे नहीं खोजे जाते,

बस

अँधेरा कंधों पर रखकर

इतना भर कहा जाता है

यह रात

किसी और की नहीं,

सींची गई थी

यही मेरी कमाई है।